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तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक आचार्य भिक्षु की जीवनगाथा और योगदान

आचार्य भिक्षु का जन्म 1726 भारत के राजस्थान के कंटालिया गांव में हुआ था. आचार्य भिक्षु (1726–1803) जैन धर्म के श्वेताम्बर तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक और प्रथम आध्यात्मिक प्रमुख माने जाते हैं। उन्हें श्रद्धालु ‘स्वामीजी’ या ‘भिक्षु स्वामी’ के नाम से भी संबोधित करते थे।

महावीर के अनुयायी आचार्य भिक्षु ने अपने आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत स्थानकवासी आचार्य रघुनाथ की टोली से की, लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने एक नई धार्मिक धारा की स्थापना की। उस समय उनके साथ 13 संत, 13 अनुयायी और 13 मूल नियम थे। इसी आधार पर इस संप्रदाय का नाम “तेरापंथ” पड़ा।

आचार्य भिक्षु ने जैन धर्म की विभिन्न विधाओं और दर्शन का गहन अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि तत्कालीन भिक्षुओं का संघ धर्म की मूल शिक्षाओं से भटक रहा था। इस स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने कठोर सिद्धांतों पर आधारित जीवन पद्धति को अपनाया और उसे ही तेरापंथ का मूल आधार बनाया।

उनके द्वारा लिखे गए “आचार पत्र” को आज भी समय और परिस्थितियों के अनुसार थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ पूरे सम्मान से माना जाता है।

जीवन परिचय
आचार्य भिक्षु का जन्म 1726 में राजस्थान के कंटालिया गांव में बीसा ओसवाल व्यापारी वर्ग में हुआ। 1751 में उन्हें स्थानकवासी आचार्य रघुनाथजी ने भिक्षु के रूप में दीक्षा दी। इसके बाद उन्होंने धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन कर संप्रदाय को नई दिशा देने का संकल्प लिया।

विचार और योगदान
आचार्य भिक्षु न केवल एक धार्मिक आचार्य बल्कि दार्शनिक, कवि, लेखक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने लगभग 38,000 श्लोकों की रचना की, जिन्हें “भिक्षु ग्रंथ रत्नाकर” नाम से दो खंडों में संकलित किया गया। उनकी कृति “नव पदार्थ सद्भाव” समाज को शोषणमुक्त बनाने और जैन दर्शन के नौ रत्नों पर गहन विमर्श करने के लिए विशेष रूप से जानी जाती है।

उन्होंने तेरापंथ संप्रदाय को “एक आचार्य, एक सिद्धांत और एक विचारधारा” के सूत्र में पिरोया। उनका मानना था कि सच्चा धर्म वही है जो इंसान को मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करे.