
संपादक की ओर से संदेश
जिसके पास अपना गांव है, उसके पास पूरा देश है।
“मेरा गांव, मेरा देश”—ये शब्द केवल एक पंक्ति नहीं हैं, ये मेरी पूरी जीवन-यात्रा का सार हैं। ये उस मिट्टी की खुशबू हैं, जो चाहे आप कितनी ही ऊँचाइयों तक क्यों न पहुंच जाएं, आपको बार-बार अपनी ओर खींच लेती है। जीवन में कई सपने पूरे होते हैं—पहली विदेश यात्रा, बड़े मंच, बड़ी पहचान और देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान में दिल्ली ब्यूरो चीफ के रूप में काम करने का अवसर। ये उपलब्धियां खुशी देती हैं, गर्व भी देती हैं। लेकिन इनके बीच एक सवाल हमेशा भीतर खड़ा रहता है—आपने अपनी मिट्टी के लिए, अपने गांव के लिए, अपने देश के लिए क्या किया?
शैक्षणिक स्थल
तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक आचार्य भिक्षु की जीवनगाथा और योगदान
आचार्य भिक्षु का जन्म 1726 भारत के राजस्थान के कंटालिया गांव में हुआ था. आचार्य भिक्षु (1726–1803) जैन धर्म के श्वेताम्बर तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक और प्रथम आध्यात्मिक प्रमुख माने जाते हैं। उन्हें श्रद्धालु ‘स्वामीजी’ या ‘भिक्षु स्वामी’ के नाम से भी संबोधित करते थे।
महावीर के अनुयायी आचार्य भिक्षु ने अपने आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत स्थानकवासी आचार्य रघुनाथ की टोली से की, लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने एक नई धार्मिक धारा की स्थापना की। उस समय उनके साथ 13 संत, 13 अनुयायी और 13 मूल नियम थे। इसी आधार पर इस संप्रदाय का नाम “तेरापंथ” पड़ा।
आचार्य भिक्षु ने जैन धर्म की विभिन्न विधाओं और दर्शन का गहन अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि तत्कालीन भिक्षुओं का संघ धर्म की मूल शिक्षाओं से भटक रहा था। इस स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने कठोर सिद्धांतों पर आधारित जीवन पद्धति को अपनाया और उसे ही तेरापंथ का मूल आधार बनाया।
उनके द्वारा लिखे गए “आचार पत्र” को आज भी समय और परिस्थितियों के अनुसार थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ पूरे सम्मान से माना जाता है।
जीवन परिचय
आचार्य भिक्षु का जन्म 1726 में राजस्थान के कंटालिया गांव में बीसा ओसवाल व्यापारी वर्ग में हुआ। 1751 में उन्हें स्थानकवासी आचार्य रघुनाथजी ने भिक्षु के रूप में दीक्षा दी। इसके बाद उन्होंने धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन कर संप्रदाय को नई दिशा देने का संकल्प लिया।
हमारा मिशन
आचार्य भिक्षु (1726–1803) जैन धर्म के श्वेताम्बर तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक और प्रथम आध्यात्मिक प्रमुख थे। उन्हें श्रद्धालु ‘स्वामीजी’ या ‘भिक्षु स्वामी’ के नाम से भी संबोधित करते थे।
हमारा मिशन आचार्य भिक्षु द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलना है — सत्य, अनुशासन और आध्यात्मिक उत्थान को जीवन का मूल आधार बनाना।
आध्यात्मिक नींव : आचार्य भिक्षु ने धर्म की मूल शिक्षाओं से भटकते समाज को सही दिशा दी और कठोर सिद्धांतों पर आधारित तेरापंथ की स्थापना की।
तेरापंथ की पहचान : 13 संत, 13 अनुयायी और 13 मूल नियमों पर आधारित यह संप्रदाय “एक आचार्य, एक सिद्धांत, एक विचारधारा” के सूत्र में बंधा है।
ज्ञान और योगदान : आचार्य भिक्षु ने 38,000 से अधिक श्लोकों की रचना की और “आचार पत्र” व “नव पदार्थ सद्भाव” जैसी अमूल्य कृतियों से समाज को शोषणमुक्त और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करने का संदेश दिया।
हमारा उद्देश्य : धर्म, दर्शन और संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति और समाज को आत्मोन्नति, सत्यनिष्ठा और मोक्ष के मार्ग की ओर प्रेरित करना।
ऐतिहासिक स्थल
गांव के गौरव
कांटालिया गाँव पाली ज़िला मुख्यालय से लगभग 59 किलोमीटर पूर्व और राज्य की राजधानी जयपुर से लगभग 274 किलोमीटर दूर स्थित है। यह गाँव जोधपुर संभाग का हिस्सा है और क्षेत्र में अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान रखता है।
देश और दुनिया का पथ प्रदर्शन करने वाले तेरापंथ सम्प्रदाय के संस्थापक और जैन समाज के महान सुधारक आचार्य श्री भीक्षू की जन्म स्थली हैं.
आचार्य भिक्षु, जिन्हें भिक्षणजी के नाम से भी जाना जाता है, ने जैन धर्म में सुधार आंदोलन की शुरुआत की थी। उन्होंने तेरापंथ सम्प्रदाय की स्थापना की और “एक आचार्य, एक सिद्धांत, एक विचार” की नीति को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षाएँ आज भी लाखों अनुयायियों के जीवन का आधार हैं।
कांटालिया गाँव पाली ज़िला मुख्यालय से लगभग 59 किलोमीटर पूर्व और राज्य की राजधानी जयपुर से लगभग 274 किलोमीटर दूर स्थित है। यह गाँव जोधपुर संभाग का हिस्सा है और क्षेत्र में अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान रखता है।
देश और दुनिया का पथ प्रदर्शन करने वाले तेरापंथ सम्प्रदाय के संस्थापक और जैन समाज के महान सुधारक आचार्य श्री भीक्षू की जन्म स्थली हैं.
आचार्य भिक्षु, जिन्हें भिक्षणजी के नाम से भी जाना जाता है, ने जैन धर्म में सुधार आंदोलन की शुरुआत की थी। उन्होंने तेरापंथ सम्प्रदाय की स्थापना की और “एक आचार्य, एक सिद्धांत, एक विचार” की नीति को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षाएँ आज भी लाखों अनुयायियों के जीवन का आधार हैं।
कांटालिया गाँव पाली ज़िला मुख्यालय से लगभग 59 किलोमीटर पूर्व और राज्य की राजधानी जयपुर से लगभग 274 किलोमीटर दूर स्थित है। यह गाँव जोधपुर संभाग का हिस्सा है और क्षेत्र में अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान रखता है।
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जनप्रतिनिधी
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