पूर्व सैनिक की नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला – पुलिस विभाग को नियमों के खिलाफ शारीरिक दक्षता परीक्षण आयोजित करने पर फटकार

जयपुर, 26 अगस्त।

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य पुलिस विभाग को आदेश दिया हैं कि वह पूर्व सैनिक दीपक सोगरवाल को उप निरीक्षक/प्लाटून कमांडर के पद पर नियुक्ति प्रदान करे.

जस्टिस आनंद शर्मा की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पूर्व सैनिकों के लिए आयोजित शारीरिक दक्षता परीक्षण 1988 के नियमों के विपरीत थी.

हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिक के लिए भर्ती प्रक्रिया में नवयुवक अभ्यर्थियों की तरह कठोर शारीरिक दक्षता परीक्षा आयोजित करने पर फटकार लगाई.

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक को उपयुक्त पद पर नियुक्त किया जाए और उसके साथ अन्याय नहीं हो.

क्या हैं मामला

अधिवक्ता सार्थक रस्तोगी के अनुसार पूर्व सैनिक दीपक सोगरवाल जो कि भरतपुर निवासी हैं, ने वर्ष 2011 में राजस्थान पुलिस में उप निरीक्षक/प्लाटून कमांडर की भर्ती प्रक्रिया के अंतर्गत आवेदन किया था.

याचिकाकर्ता कि ओर से याचिका में कहा गया कि 28 फरवरी 2011 को राजस्थान स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (उत्तरदाता संख्या 2) द्वारा पूर्व सैनिकों के लिए जो शारीरिक दक्षता परीक्षण आयोजित कि गई थी. वह “राजस्थान सिविल सेवा 1988” के प्रावधानों के विरुद्ध थी.

पैरवी करते हुए अधिवक्ता सार्थक रस्तोगी ने अदालत से कहा कि 2009 की भर्ती प्रक्रिया में 5 किलोमीटर दौड़, स्प्रिंट, पुश-अप्स, लंबी कूद जैसे कठिन शारीरिक परीक्षण पूर्व सैनिकों पर थोपे गए, जो कि राजस्थान सिविल सेवा (पूर्व सैनिकों के समायोजन) नियम, 1988 के विपरीत है.

नवयुवक की तरह नहीं आंका जा सकता

इन नियमों के तहत पूर्व सैनिकों के लिए केवल साधारण शारीरिक फिटनेस की आवश्यकता का प्रावधान किया गया हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व सैनिक पहले ही सेना में कठोर शारीरिक प्रशिक्षण और सेवा कर चुके होते हैं, इसलिए उन्हें नवयुवक अभ्यर्थियों के समान नहीं आँका जा सकता.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पूर्व सैनिक पर राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम, 1989 लागू करना, विशेष रूप से पूर्व सैनिकों के पुनर्वास हेतु बनाए गए 1988 के नियमों की मंशा को विफल कर देगा.

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक की उम्मीदवारी कों 1988 के नियमों के तहत पुन: परीक्षण करने के आदेश दिए.

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में सफल पाए जाते है तो उन्हे उपयुक्त पद पर नियुक्त किया जाए.

हालाकि हाईकोर्ट ने वास्तविक वित्तिय लाभ देने से इंकार करते हुए काल्पनिक वरिष्ठता और वेतन निर्धारण लाभ देने के आदेश दिए.

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